Aug 27, 2010

देश में महगाई चलो खाये मलाई


अब ये तो पता नही कि "कितने प्रतिशत भारतीय पुरुष जेब भरी रहने पर ऊल जलूल (माफ किजियेगा फालतू) खरिददारी करते है?" पर हॉ! बात सच है और उनमें से एक तो खुद हू दुसरे ऐसे चार दर्जन लोगो को जानता भी हू। और ऐसा ही साहस आप खुद में भी पाते है तो आपको ज्यादा खर्च करने की आदत है जिसपर संयम रखने कि दरकार है भले ही आपके पास धन की कितनी ही बहुतायत क्यों न हो। अपने खर्चों पर नियंत्रण के लिए और आदतन खर्चा करने से बचने के लिए कुछ आचूक नुस्खे मिले है, पेश-ए-खिदमत है-

अपने पास एक छोटा नोटपैड रखिये जिसमें आप उन चीज़ों को नोट करते जायें जिन्हें आप खरीदना चाहते हैं। बाज़ार में जायें तो इस नोटपैड पर बिलकुल भी याद ना रखें (हो सके तो ले ही ना जाये। नोटपैड,कौन सा साथ चलने कि जिद करेगा आपसे?) भले ही आप दुकान से सामान लेते हों या ऑनलाइन, चीज़ें नोट कर लें और उनकी लिस्ट बना लें। आप उन चीज़ों को खरीदें या न खरीदें, उनकी लिस्ट बना ले और यकिन माने ये सब लिखते हुये मै, आपको इतना फ्रि समझ रहा हू कि ये सब आप जरुर करेंगे। क्योकि भाई कमाते किस लिये? पैसे के लिये ही ना! तो उसका हिसाब तो रखेंगे कि नही? इसका फायदा ये होता है कि  हमे पता लगता है कि हमारे अवचेतन मन में पैसा खर्च करने के संस्कार कितने गहरे हैं। यदि आपको इसका आभास न हो तो आप खर्च करने की आदत पर नियंत्रण न कर पाएंगे।

अब इन नुस्खों पर अमल करके देखें:

* बड़े मॉल या डिपार्टमेंटल स्टोर या सुपर बाज़ार से खरीददारी न करे – क्योकि वहां जाने भर से यह तय हो जाता है कि आप अनावश्यक खर्च करने जा रहे हैं। खरीदना है राशन और दूसरे सामानों के बीच में से उन्हें देखते हुए गुज़रना आह! हा !हा ! अब मन में उन्हें लेने की पवित्र और दृण इच्छा जाग्रत हो जाती है, और खुश भी हो जाता हू कारण ये सेल्स गर्ल्स इतनी गुणवान और चमत्कारी होती है कि मै काला दंत मंजन मांगू वो भी हाजिर और कुछ ना मांगू तो ये खुद हाजिर मेरी मनोकामना पूर्ण करने के लिये। ये लिबर्टी (जूते नही) और खुलापन किसी छोटी दुकान से सामान लेंने या फोन करके ज़रूरी सामान घर बुला लेने में कहॉ मिलेगा !!! मै ये जुनून मिट नहीं सकता भले ही इस चक्कर में ये बड़े-बड़े मॉल या सुपर बाज़ार वाले मेरी जेब ही क्यों न कट लें।

* जो सामान रोज़ ही लेना पड़ता हो उसे घर पर ही बुलाये – घर में छोटे बच्चे हैं और दूध तो रोज़ लगता ही है। पहले जब ज़रूरत होती थी तब बच्चे को गोद में लेकर कॉलोनी की दुकानों से दूध लेने चला जाता था। दुकान में बच्चा दूसरी चीज़ें जैसी चौकलेट-चिप्स लेने की जिद करता था और मैं ले लेता हू । यारो बच्चो के मामले में कंजूसी मुझे पसंद नहीं है अब चौकलेट-चिप्स जैसी चीज़ें स्वास्थ्यकर नहीं हैं तो क्या हुआ!! डॉक्टर है ना। बच्चे के साथ दूध दुकान जितना कम जाऊँगा, गैरज़रूरी सामान पर खर्चा भी उतना ही कम होगा। और फिर कमाते किसलिये है हम ? बच्चो के लिये ही ना। बच्चे को घर में ही स्वास्थ्यकर चीज़ें बनाकर देने से पडोसी बैकवर्ड समझेंगे वो अलग से।

* सामान की लिस्ट बनानाअमाँ यार कौन करेगा ये सब, ज़रूरी सामान याद आये तो उसी समय लिखो। फिर बाज़ार जाने पर लिस्ट के अनुसार ही खरीददारी करना। फिर चेक करो कोई सामान छूट तो नहीं रहा है। बार-बार बाज़ार जाने से लोग पहचान जाते है, नतीज़तन चुनाव में खडा होना पडा तो लोग बाग भी जानते रहे होगे ।

* खर्चे को टालने का प्रयास करें – इसके लिए एक ३०-दिवसीय लिस्ट बना शुरू कर दें। जब भी कुछ खरीदने कि इच्छा हो तो संकल्प के साथ लें ही डाले । यदि १ महीने बाद उसे खरीदना गैर ज़रूरी लगा तो??

· परिवार के साथ दूसरे तरीकों से समय व्यतीत करें – अब हर परिवार में कोई-न-कोई तो पैसा-उडाऊ होता ही है। मेरा तो हफ्ते में दो बार या महीने में 7-8 बार बाज़ार या मल्टीप्लेक्स जाने का रिवाज़ है।

· किफायत से चलनेवाले को खरीददारी करने दें – बंधी मुठ्ठी से चलना पैसा बचाता है पर ये कंजूस लोग ही हो सकते है क्योकि अभी भी मेरी आदतन ज्यादा खर्च करने की प्रवृत्ति पर पूरा नियंत्रण नहीं हुआ है। मेरी मॉ किफायत से चलती है, मोल-भाव करने में भी एक्सपर्ट हैं और इसीलिए मैं खरीददारी के लिए उन्हे आगे कर देता हूँ।

पैसा खर्च करने पर नियंत्रण करने, किफायत से चलने, और पैसा बचाने के दूसरे तरीकों पर आगे और चर्चा करेंगे। तब तक के लिए, पढ़ते रहिये।

यह पोस्ट निशांत का हिंदीज़ेन ब्लॉग से कुछ हेरफेर के साथ ली गई है।



Shakti Shukla Financial Consultant VSS MARKET COMPLEX, chhend colony Rourkela

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